कितना अजीब है ना

कितना अजीब है ना,

तुम किसी को खुशी देते चले गए,
किसी अपने को दुख देकर।
तुम किसी के होंठों पर मुस्कान लाते चले गए,
किसी अपने के आंखों में आंसू भरकर।

तुम किसी का पेट भरते चले गए,
किसी अपने का निवाला छीन कर।
तुम किसी को सुलाते रहे,
किसी अपने की नींद छीन कर।

तुम किसी के साथ इंसाफ करते रहे,
किसी अपने को धोखा दे कर।
तुम किसी को बेदाग दिखातेे रहे,
अपने अजीज पर लांछन लगाकर।

तुम किसी को सुकून देते रहे,
किसी अपने को दर्द देकर।
तुम किसी का खयाल रखते रहे,
किसी अपने का नुक्सान कर कर।

तुम किसी का साथ देते रहे,
किसी अपने को तनहाईयों में डाल कर।
तुम किसी को समझते रहे,
किसी अपने को अंजान बना कर।

तुम किसी को आगे बढ़ाते रहे,
किसी अपने को रौंद कर।
तुम किसी को बचाते रहे,
किसी अपने का गला घौंट कर।

तुम किसी को सुरक्षित रखते रहे,
किसी अपने को हमेशा के लिए दफना कर।

यह बात भी सच है कि,

पूछने से आखिर होगा भी क्या?
क्यों कि मैं तो चुप ही थी।

कल भी, आज भी,
जब तुम मुझको हमेशा ही,
गुनहगार कह कटघरे में,
भरी सभा में खड़ा कर गए।
क्या पता, तुम मुझको या मैं तुमको,
कौन किसको ना समझ सका।

स्नेहा