उम्मीदों का ये जहाँ सारा, है उसी का जो है दिलजला। देख कठिनाईयां, परेशानियां, वो दुगनी गति से चल पड़ा। हिम्मत है मित्र उसकी, दृढ़ निश्चय है भाई। न रुका, थका, थमा, हारा वह, मायूसी न उसके मुख पर छाई। चला अकेला, मदमस्त मनचला वह, जब भी मदद न उसने पाई। जग ने टोका, बोला- "अरे मूर्ख न पाओगे कुछ, गिरकर किसने है मंजिल पाई?" मुस्कुराकर, वह बोला- "कुंदन वही जो तपे अग्नि में, कहां अकेला मैं? साथ हैं, मेरे मित्र और भाई! जग में पाया शीर्ष उसी ने, जिसने अपनी मंजिल खुद ही बनाई।" स्नेहा
Category: Poem
आखिर कुसूर क्या था मेरा?
रात के सन्नाटे में, जब अंधेरा था गहरा । दिल के दहलाने वाले दर्द ने, उस काली रात से पूछा: "क्यों, मुझे ही क्यों चुना तूने, आखिर कुसूर क्या था मेरा?" रात की तन्हाई ज़ोर से हंसने लगी, बोली, "अगर सुन पाए तो आज तू सुन, मैं बतलाऊ कि कुसूर क्या था तेरा, मगर ज़रा संभलना कहीं तेरे, कानों से खून ना बह निकले। अपने टूटे सपनों को, उन खुदगर्ज रिश्तों से। अपने खाली हाथों को, उन झूठी सौगातों से। अपने बेरंग ज़िन्दगी को उन फीके रंगों से । बंजर सूखी आंखों को, खून की नदियों से भरने चली। यह था कुसुर तेरा। तूने उड़ान भरने की कोशिश की, जब की तू रौंदने के लिए बनी थी। तूने अपना विश्वास गिरवी रखा वहां, जहां सिर्फ झूठ का अस्तित्व था। तूने अपना हाथ बढ़ाया वहां, जहां हाथों की बलि चड़ती थी। तू उस शहर में बसने गई, जहां रिश्ते सिर्फ बिकते थे। अरे जा, जा तू है कुसुरवार, जो पैदा उस दुनिया में हुई, जहां रिश्तों का व्यापार होता है, और वायदे तोड़े जाने वाले खेल। ज़िन्दगी में एक बार फिर तूने, बेखौफ और सुहाने सपने पिरोए। तूने एक ऐसे शख्स को ज़िन्दगी बनाया, जिसके लिए तू सिर्फ एक और लड़की थी। क्या कुसूर था तेरा, तो सुन आज फिर बताऊं: तेरा निश्चल विश्वास, तेरी सच्चाई, तेरी मुस्कुराहट, तेरे वायदे, तेरा इंतज़ार, तेरा खुश होना, तेरा सुकून, तेरा जीने की उम्मीद करना, तेरा किसी के लिए मारना, तेरा ढकोसले ना करना, तेरा दिखावा ना करना, तेरा धोखेबाज ना होना, तेरा किसी के दर्द को अपना लेना, तेरा किसी अपने के लिए दिल धड़कना, तेरा किसी अपने के लिए सांसे चलना, तेरा किसी को बेइंतहां प्यार करना, यह सब था कुसूर तेरा। जब तू बनाई ही गई थी पत्थर, तो उस पत्थर में जान डालना था, कुसूर तेरा।" स्नेहा
कोरे कागज़ पर लिखी, वो अधूरी कहानी।
सुबह सुबह की चाय की प्याली, डायरी के कुछ पुराने पन्ने, दिल के करीब एक कोरा कागज़, जिसमें थी एक अधूरी कहानी। दो अधूरे अजनबी परिंदे, और उनकी अधूरी यादें। शर्माती, झुकती हुई निगाहें, उनके काजल की वो अधूरी कशिश। वो किसी की उंगलियां गिटार के तारों को छेड़ती हुई, मानो कानों में कहे कुछ लफ्ज़ अनकहे। ये जानते हुए की कोई मरता है, इतराते हुए वो बालों को अधूरा सहलाना। कभी ना खत्म होने वाली, कुछ अधूरी खूबसूरत लम्बी बातें। एक साथ कहीं बैठ कर, वो अधूरे से ख्वाब बुनना। किसी कॉफी टेबल की इर्द गिर्द, दो शक्स और उनकी अधूरी स्ट्रॉन्ग कॉफी। पनीर की वो सब्ज़ी किसी को खिलाना, दूसरे का पेट अधूरा होते हुए भी भर जाना। कुछ खाली सड़कों का लम्बा सफर, बाईक के पहियों का वो अधूरा मकसद। किसी एक के चोट लगना या गिर जाना, और दूसरे की अधूरी सी तकलीफ। चेहरे की वो हल्की शिकंद पढ़कर, किसी का अधूरे लफ्ज़ सुन लेना। परेशानी में झुझते हुए देख कर, अधूरा "में हूं ना" का सुकून दे जाना। अधूरी ख्वाहिशें, वो अधूरी बहस, अधूरी लाचारी, अधूरे झगड़े, अधूरा रूठना, अधूरा मनाना, अधूरे तीन अन्मोल लफ्ज़, अधूरा गले लगाना। सच में, अधूरी ही थी ये दास्तां, तभी तो कोरे कागज़ पर उकेरी है। अधूरी ज़रूर है मगर सच्ची भी है, तभी तो अधूरे से पूरे तक का सफर अभी बाकी है। स्नेहा
Couplet: The Destiny of Path
रात तक सारे पंछी उड कर अपने आशियाने पहुंचे, बस रास्ता ही अपनी मंजिल का इंतजार करता रह गया। स्नेहा
Translation:
By nightfall, all birds reached their nests, Only the path kept on waiting for its destination. Sneha