धोखेबाजों का शहर

धोखेबाजों के शहर में,
एक बार मैंने घर बसाया।
सच्चाई नाम के सफ़ेद पर्दों से,
उन्होंने अपना घर सजाया। 

घर आओ, मिलकर रहेंगे,
कह मुझे फुसलाया।
मिठाईयाँ, शर्बत और खीर, 
सब मुझे मुसकुराकर खिलाया। 

फिर अपना बन कर, 
लुभावनी बातों से, 
अपना विश्वास जीत,
मुझे गले लगाया। 

अंत था,
हाँ वो अंत था मेरा। 
मेरे विश्वास का, मेरी सहजता का,
मेरी मासूमियत का, मेरे संघर्ष का।

गौर से देखने पर,
सब समझ मुझे आया। 

वो सफ़ेद पर्दे तो काले कफ़न थे,
मिठाईयाँ नमकीन व तीखी,
शर्बत तो मेरा ही ख़ून था,
और वो खीर, कड़वा ज़हर। 

जब इन सबको मैंने झेल लिया, 
तब बातों के बाण चलाए।
मैं गलत हूँ, कपट से भरी,
स्वयं के दिल में चोर होते हुए,
मुझे ही फरेबी बतलाया।

कर्मभूमि के भीष्म जैसे, 
फिर भी मैंने साहस रखा।
तब उन्होंने अपना,
आखरी दांव लगाया। 

माफ़ी और वादों की वर्षा कर,
मुझे फिर इस बार गले लगाया। 
उस दिन बच ना पाई, हार गई,
गिर गई, और आखरी सांस ली।

झूठों के उस शहर में, 
फिर एक कत्ल हुआ था।
मुखौटों ने इस बार, गले लगा कर,
मेरी पीठ पर खंजर जो घुसाया था। 

कितना अजीब है ना

कितना अजीब है ना,

तुम किसी को खुशी देते चले गए,
किसी अपने को दुख देकर।
तुम किसी के होंठों पर मुस्कान लाते चले गए,
किसी अपने के आंखों में आंसू भरकर।

तुम किसी का पेट भरते चले गए, 
किसी अपने का निवाला छीन कर।
तुम किसी को सुलाते रहे,
किसी अपने की नींद छीन कर।

तुम किसी के साथ इंसाफ करते रहे,
किसी अपने को धोखा दे कर।
तुम किसी को बेदाग दिखातेे रहे, 
अपने अजीज पर लांछन लगाकर।

तुम किसी को सुकून देते रहे, 
किसी अपने को दर्द देकर।
तुम किसी का खयाल रखते रहे,
किसी अपने का नुक्सान कर कर।

तुम किसी का साथ देते रहे,
किसी अपने को तनहाईयों में डाल कर।
तुम किसी को समझते रहे,
किसी अपने को अंजान बना कर।

तुम किसी को आगे बढ़ाते रहे,
किसी अपने को रौंद कर।
तुम किसी को बचाते रहे,
किसी अपने का गला घौंट कर।

तुम किसी को सुरक्षित रखते रहे,
किसी अपने को हमेशा के लिए दफना कर।

यह बात भी सच है कि,

पूछने से आखिर होगा भी क्या?
क्यों कि मैं तो चुप ही थी।

कल भी, आज भी,
जब तुम मुझको हमेशा ही,
गुनहगार कह कटघरे में,
भरी सभा में खड़ा कर गए।
क्या पता, तुम मुझको या मैं तुमको,
कौन किसको ना समझ सका।

स्नेहा

आखिर कुसूर क्या था मेरा?

रात के सन्नाटे में,
जब अंधेरा था गहरा ।
दिल के दहलाने वाले दर्द ने,
उस काली रात से पूछा:

"क्यों, मुझे ही क्यों चुना तूने,
आखिर कुसूर क्या था मेरा?"

रात की तन्हाई ज़ोर से हंसने लगी,
बोली,

"अगर सुन पाए तो आज तू सुन,
मैं बतलाऊ कि कुसूर क्या था तेरा,
मगर ज़रा संभलना कहीं तेरे,
कानों से खून ना बह निकले।

अपने टूटे सपनों को,
उन खुदगर्ज रिश्तों से।
अपने खाली हाथों को,
उन झूठी सौगातों से।
अपने बेरंग ज़िन्दगी को
उन फीके रंगों से ।
बंजर सूखी आंखों को,
खून की नदियों से भरने चली।
यह था कुसुर तेरा।

तूने उड़ान भरने की कोशिश की,
जब की तू रौंदने के लिए बनी थी।
तूने अपना विश्वास गिरवी रखा वहां,
जहां सिर्फ झूठ का अस्तित्व था।

तूने अपना हाथ बढ़ाया वहां,
जहां हाथों की बलि चड़ती थी।
तू उस शहर में बसने गई,
जहां रिश्ते सिर्फ बिकते थे।

अरे जा, जा तू है कुसुरवार,
जो पैदा उस दुनिया में हुई,
जहां रिश्तों का व्यापार होता है,
और वायदे तोड़े जाने वाले खेल।

ज़िन्दगी में एक बार फिर तूने,
बेखौफ और सुहाने सपने पिरोए।
तूने एक ऐसे शख्स को ज़िन्दगी बनाया,
जिसके लिए तू सिर्फ एक और लड़की थी।

क्या कुसूर था तेरा,
तो सुन आज फिर बताऊं:

तेरा निश्चल विश्वास,
तेरी सच्चाई, तेरी मुस्कुराहट,
तेरे वायदे, तेरा इंतज़ार,
तेरा खुश होना, तेरा सुकून,
तेरा जीने की उम्मीद करना,
तेरा किसी के लिए मारना,
तेरा ढकोसले ना करना,
तेरा दिखावा ना करना,
तेरा धोखेबाज ना होना,
तेरा किसी के दर्द को अपना लेना,
तेरा किसी अपने के लिए दिल धड़कना,
तेरा किसी अपने के लिए सांसे चलना,
तेरा किसी को बेइंतहां प्यार करना,
यह सब था कुसूर तेरा।

जब तू बनाई ही गई थी पत्थर,
तो उस पत्थर में जान डालना था, कुसूर तेरा।"

स्नेहा