
A poetic journey through storms, trials, and hope – a reminder that one morning, even defeat will bow before you.
When Opportunity Calls (जब अवसर दस्तक देगा)

When Opportunity Calls (जब अवसर दस्तक देगा)

गीत विदाई का

ज़िन्दगी शायरी हो गई

पुरानी यादें




कब तक मैं और सहूँ,
कब तक मैं और राह तकूँ,
क्यों बैठे हो तुम अब गुम,
ज़रा बतला तो दो तुम,
जीवन लिया नारी का,
है ये मेरी गलती क्या?
मेरी आत्मा है आज तुमसे पूछे,
क्यों सब हो आँख मूँदे,
कब तक मैं और सहूँ,
कब तक मैं और राह तकूँ,
क्या भूल गए हो इंसानियत,
ऐसी चढ़ी हुई ये हैवानियत,
बच्ची, युवा और वृद्ध,
नहीं इनमें कोई अंतर?
हवस की आग यूँ भड़की तुम में,
भूल गए पैदा हुए तुम मुझमें,
अग्नि परीक्षा तो हाल लेने आ जाते हो,
कृष्ण सम, क्या पुकारने पर तुम आते हो?
क्या मर गया है ज़मीर अब,
खड़े थे तुम बस स्तब्ध
कहाँ चली जाती तुम्हारी देशभक्ति,
जब एक अभला है सताई जाती,
कब तक मैं और सहूँ,
कब तक मैं और राह तकूँ?
कैसी विपदा है तुमने ढायी,
कितनी निर्भाया की है तुमने बली चढ़ाई,
सहन नहीं कर पाते तुम एक भी खरोंच,
कैसे मौन हो तुम देख ये प्रकोप,
क्या हाथों में चूड़ी पहने हो,
क्या कानो में रूई डाल के सोते हो,
क्या इस शक्ति की भूमि में तुम्हारी,
क्यों एक नारी है अभला बेचारी,
कब तक मैं और सहूँ,
कब तक मैं और राह तकूँ?
कहीं ऐसा ना हो रौद्र रूप कल्कि प्रकट हो,
जिनका स्वरूप विशाल, विकराल हो
ना छोड़ेंगे किसी को , वे हैं प्रचंड बड़े,
वो भी ना बचेंगे जो मूक दर्शक बनकर हैं खड़े,
कब तक मैं और सहूँ,
कब तक मैं और राह तकूँ?

